Varalakṣmī Vrata — Pūjā Vidhi

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भाग 1 — पूजा सामग्री की तैयारी

वेदी और कलश हेतु

  • कलश (चाँदी, ताँबे या पीतल का — चाँदी सर्वोत्तम)
  • नारियल (एक कलश के लिए; दूसरा शुद्धि-कलश के ऊपर हेतु)
  • गंगाजल (शुद्ध जल; यदि गंगाजल उपलब्ध न हो, मन्त्र-अभिमन्त्रित नदी या कुएँ का जल)
  • आम्रपत्र (पाँच; न मिलने पर तीन)
  • हरिद्रा-चूर्ण (हल्दी) — कलश पर लेप हेतु
  • कुंकुम
  • चन्दन-लेप
  • देवी का मुखवत्र (चेहरा) एवं शृंगार-सामग्री — बिन्दी, आभूषण, केश-सज्जा
  • अक्षत (शुद्ध चावल के दाने) — वेदी पर बिछाने और अर्पण दोनों हेतु
  • चावल का आटा, कुंकुम, हल्दी — वेदी के समक्ष रंगोली हेतु

व्रत-कार्य हेतु

  • साड़ी (रेशम श्रेष्ठ) या ब्लाउज़-पीस — देवी को अर्पण
  • फूल — मिश्रित; मल्लिका, चम्पा, कमल (यथा-उपलब्ध)
  • बिल्वपत्र
  • पूगीफल (सुपारी)
  • नागवल्ली-दल (पान के पत्ते) — 10-15 पूजा हेतु, 20 प्रसाद वितरण हेतु अतिरिक्त
  • पञ्चामृत-सामग्री: कच्चा दूध, दही, मधु, शर्करा, गंगाजल
  • केले
  • पाँच प्रकार के फल — सेब, अमरूद, नाशपाती, केला, अनार, मक्का — या ऋतु-अनुसार
  • नारियल (दो अतिरिक्त, संरचनात्मक भूमिका हेतु)
  • दीपक, बत्ती, शुद्ध घी (बिना गर्म किया हुआ)
  • काला चना — वायन-दान हेतु
  • धूप / साम्ब्राणी
  • कपूर — नीराजन हेतु
  • हल्दी की समूची गाँठ (कच्ची) सूती धागे के साथ, अथवा मौली — तोरण-बन्ध हेतु, 2 सेट
  • 9 गाँठों वाला तोरण-सूत्र — सफ़ेद सूती धागा (5 या 9 धागे), हल्दी-लेप
  • 3, 5 या 7 प्रकार के प्रसाद (नैवेद्य) — शुद्धता से पकाए; मीठे और नमकीन दोनों
  • पुष्प-माला
  • केले के पत्ते — प्रसाद रखने हेतु
  • केले के पौधे (यदि उपलब्ध — वेदी की शोभा हेतु)
  • शुद्धता से भिगोकर सुखाए वस्त्र — अगले दिन पाकशाला में पहनने हेतु
  • सिक्के / नोट — ताम्बूल हेतु
  • हाथ पोंछने का वस्त्र

वायन-दान हेतु (सुमङ्गलियों को)

  • 5, 7 अथवा 9 वायन-सेट (परिवार की सामर्थ्य अनुसार; दक्षिण-भारत में सामान्यतः 5)
  • प्रत्येक वायन में द्वादश-पूर (12 वस्तुएँ): भीगा काला चना, फल, पान-पत्ता, सुपारी, थोड़ी हल्दी, थोड़ा कुंकुम, अक्षत, सिक्का, वस्त्र-खण्ड (ब्लाउज़-पीस), और अन्य पारम्परिक वस्तुएँ

भाग 2 — कलश-स्थापना (पूर्व सन्ध्या)

पारम्परिक रूप से यह क्रिया व्रत के पूर्व दिन सन्ध्या समय की जाती है। स्नान के पश्चात्। स्नान से कलश-स्थापना पूर्ण होने तक साधक भोजन ग्रहण न करे।

  1. रंगोली। चावल के आटे, कुंकुम, हल्दी से वेदी-स्थान पर छोटी रंगोली बनाइये। यह कलश का आधार है।
  1. कलश-स्थान (आधार) रखिये। रंगोली के ऊपर कलश-स्तम्भ या पीठिका रखिये। ऊपर कच्चे चावल की पर्त समान रूप से बिछाइये।
  1. कलश-स्थापन। कलश को (जिसके सम्पूर्ण शरीर पर हल्दी-कुंकुम पहले से लगा हो) चावल पर स्थापित कीजिये।
  1. कलश भरना। कलश में गंगाजल भरिये। साथ में निम्न पाँच द्रव्य डालिये:
  • अक्षत (मुट्ठी भर)
  • हल्दी-चूर्ण
  • कुंकुम
  • चन्दन-चूर्ण
  • गंगाजल (मुख्य)
  1. आम्रपत्र। पाँच आम्रपत्र कलश के मुख पर व्यवस्थित कीजिये — डण्ठल भीतर, पत्ते बाहर की ओर।
  1. नारियल। एक नारियल को हल्दी-कुंकुम से पूर्ण-लेपित कीजिये। आम्रपत्रों के ऊपर स्थापित कीजिये — नुकीला भाग (शिर) ऊपर की ओर।
  1. देवी का मुख एवं शृंगार। नारियल पर देवी का मुखवत्र लगाइये। शृंगार पूर्ण कीजिये — केश, आभूषण, बिन्दी, छोटी माला।
  1. आच्छादन। सम्पूर्ण संरचना पर वस्त्र ढँकिये — देवी का मुख सामान्य दृष्टि से छिपा रहे। इस आच्छादन को अगले दिन महागणपति-पूजा के पश्चात् ही हटाया जाता है।
  1. शुद्धि-कलश हेतु द्वितीय पात्र। मुख्य कलश के पास एक दूसरा पीतल का पात्र (बिना नारियल के) रखिये। यह शुद्धि-जल तथा कलश-पूजा के समय उपयोग होगा। (यदि साक्षात् मूर्ति का प्रयोग हो रहा हो, तब भी एक कलश-नारियल अनिवार्य है।)

सन्ध्या-समय की अन्य तैयारियाँ (कलश-स्थापना के समानान्तर):

  • अगले दिन के प्रसाद की पूर्व-तैयारी (भिगोना, पीसना — जो आवश्यक हो)
  • सभी पूजा-पात्र धो कर रखिये
  • पूजा-सामग्री पूजा-कक्ष में एक स्थान पर वस्त्र या स्वच्छ कागज़ से ढँक कर रखिये
  • फूल आदि नाशवान सामग्री रेफ्रिजरेटर के पृथक भाग में सुरक्षित रखिये
  • किसी भी प्रसाद की तैयारी सन्ध्या को न करें — पाककार्य केवल अगली सुबह हो
  • 5, 7 अथवा 9 वायन-सेट (सुमङ्गली-संख्या-अनुसार) तैयार करके अलग स्थान पर रखिये

भाग 3 — मुख्य पूजा विधि (व्रत के दिन प्रातःकाल)

3.0 — पूर्व-तैयारी (आरम्भ से पूर्व)

  • प्रसाद पका कर केले के पत्तों पर थालियों में सजाइये
  • फल-फूल क्रम से रखिये
  • अक्षत को हल्दी, कुंकुम और गंगाजल के साथ मिलाइये
  • दीपकों में घी भर कर बत्तियाँ तैयार रखिये
  • ताम्बूल के लिये सिक्के और वस्तुएँ मुख्य प्रसाद से अलग रखिये
  • तोरण (2 सेट, प्रत्येक में 9 गाँठें, हल्दी की गाँठ + पान का पत्ता, अथवा फूल) पहले से तैयार करके अलग थाली में रखिये — इन्हें तोरण-बन्ध-पूजा-विधान के पश्चात् ही बाँधना है, पहले नहीं
  • पञ्चामृत मिलाकर तैयार रखिये
  • वायन-सेट (5, 7 अथवा 9) व्यवस्थित करके अलग रखिये — देवी को अर्पण एवं तत्पश्चात् सुमङ्गलियों को दान हेतु
  • आसन-व्यवस्था तैयार कीजिये
  • दुर्मुहूर्त की जाँच करें — स्थानीय पञ्चाङ्ग से समय-निर्धारण सुनिश्चित करें
  • अनुमानित कुल समय: 2 से 2.5 घण्टे (पूर्ण गणपति-षोडशोपचार सहित)

3.1 — आचमन (आत्म-शुद्धि)

दायें हाथ की हथेली से तीन बार जल का आचमन कीजिये, प्रत्येक बार निम्न मन्त्र का उच्चारण करते हुए:

ॐ केशवाय स्वाहा
ॐ नारायणाय स्वाहा
ॐ माधवाय स्वाहा

तत्पश्चात् जल से निम्न अङ्गों का स्पर्श कीजिये:

ॐ गोविन्दाय नमः — हाथ पोंछिये
ॐ विष्णवे नमः — नेत्रों पर स्पर्श

आगे विष्णु के अठारह-नामों का उच्चारण करते हुए (मधुसूदन, त्रिविक्रम, वामन, श्रीधर, हृषीकेश, पद्मनाभ, संकर्षण, वासुदेव, प्रद्युम्न, अनिरुद्ध, पुरुषोत्तम, अधोक्षज, नारसिंह, अच्युत, जनार्दन, उपेन्द्र, हरि, श्री कृष्ण) — प्रत्येक नाम के साथ नमः जोड़ते हुए, इन्द्रियों की शुद्धि कीजिये।

3.2 — भूत-शुद्धि एवं प्राणायाम

अक्षत को अपने पीछे की ओर छिड़किये, यह मन्त्र बोलते हुए:

उत्तिष्ठन्तु भूतपिशाचाः ये ते भूमिभारकाः ।
एतेषामविरोधेन ब्रह्मकर्म समारभे ॥

व्याहृति एवं गायत्री-मन्त्र से प्राणायाम कीजिये:

ॐ भूः ॐ भुवः ॐ सुवः ॐ महः ॐ जनः ॐ तपः ॐ सत्यम् ।
ॐ तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि ।
धियो यो नः प्रचोदयात् ॥
ॐ आपो ज्योती रसोऽमृतं ब्रह्म भूर्भुवस्सुवरोम् ॥

3.3 — संकल्प

संकल्प व्रत का हृदय है — इसमें साधक अपने स्थान, समय, गोत्र, नाम एवं व्रत के उद्देश्य की घोषणा करता है। यह सम्पूर्ण संकल्प यहाँ यथावत् प्रस्तुत है ताकि कुछ भी स्मृति पर नहीं छूटे।

संकल्प उच्चारण से पूर्व: दायें हाथ में जल, अक्षत, पुष्प, एक सिक्का लेकर बायें हाथ पर रखिये। संकल्प पूर्ण होने पर यह सब जल-पात्र में छोड़ दीजिये।

पूर्ण संकल्प (संस्कृत):

ममोपात्त-समस्त-दुरितक्षय-द्वारा श्री-परमेश्वर-प्रीत्यर्थम्, शुभे शोभने मुहूर्ते, आद्य-ब्रह्मणः द्वितीय-परार्धे, श्वेत-वराह-कल्पे, वैवस्वत-मन्वन्तरे, कलियुगे प्रथम-पादे, जम्बूद्वीपे, भारत-वर्षे, भारत-खण्डे, मेरोः दक्षिण-दिग्भागे,

[DEŚA-KṢETRA] पुण्य-क्षेत्रे,

समस्त-देवता-ब्राह्मण-हरिहर-सन्निधौ, वर्तमान-व्यावहारिक-चान्द्रमानेन

Parābhava नाम-संवत्सरे, Dakṣiṇāyana अयने, Varṣā ऋतौ, Śrāvaṇa मासे, Śukla पक्षे, Pūrṇimā तिथौ, Śukravāra वासरे, Śatabhiṣā नक्षत्रे, शुभ-योगे शुभ-करणे, एवंगुण-विशेषण-विशिष्टायां शुभ-तिथौ,

श्रीमत्याः / श्रीमतः [GOTRA] गोत्रस्य / गोत्रायाः, [NĀMA] नामधेयस्य / नामधेयायाः,

[विवाहिता स्त्रियों के लिये यह पंक्ति जोड़िये; अविवाहिता, विधवा, या अन्य पारिवारिक स्थिति में यह पंक्ति छोड़िये:]

धर्मपत्नी श्रीमती [स्वयं का जन्म-नक्षत्र यहाँ] नक्षत्रे —

अस्माकं सह-कुटुम्बानाम् क्षेम-स्थैर्य-विजय-अभय-आयुर्-आरोग्य-ऐश्वर्य-अभिवृद्ध्य्-अर्थम्, धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष-चतुर्विध-फल-पुरुषार्थ-सिद्ध्य्-अर्थम्, सत्-सन्तान-सौभाग्य-फल-प्राप्त्य्-अर्थम्, श्री-महागणपति आवाहन-पूजा तद्-अनन्तरं श्री-वरमहालक्ष्मी-देवी-मुद्दिश्य श्री-वरमहालक्ष्मी-देवी-प्रीत्यर्थम् कल्पोक्त-विधानेन यथा-शक्ति ध्यान-आवाहन-आदि षोडशोपचार-पूजां करिष्ये ।

अन्त में दायें हाथ की मध्यमा से जल स्पर्श कीजिये (जल-स्पर्शन)।

संकल्प में भरे जाने वाले मान — विस्तृत विवरण:

A. अपने-आप भरे जाने वाले मान (शुभकाल के पञ्चाङ्ग-इंजन से):

व्रत-दिवस के आधार पर निम्न आठ मान स्वतः रेण्डर होंगे — साधक को इन्हें अलग से नहीं भरना है, ये प्रकाशित PDF में उस वर्ष के लिये पूर्व-लिखित होंगे:

मान विवरण उदाहरण (2026 के लिये)
Parābhava चान्द्र-वर्ष का नाम (60-वर्षीय चक्र से) पराभव
Dakṣiṇāyana उत्तरायण या दक्षिणायन दक्षिण अयने
Varṣā ऋतु — षड्-ऋतुओं में से वर्षा ऋतौ
Śrāvaṇa चान्द्र-मास श्रावण मासे
Śukla शुक्ल अथवा कृष्ण पक्ष शुक्ल पक्षे
Pūrṇimā तिथि एकादश्यां (उदाहरण; व्रत-दिवस पर तिथि यहाँ आयेगी)
Śukravāra वार (सप्ताह का दिन) भृगुवासरे (शुक्रवार)
Śatabhiṣā उस दिन का नक्षत्र उत्तराषाढ़ा नक्षत्रे

B. साधक द्वारा भरे जाने वाले मान (व्यक्तिगत जानकारी — यह PDF में रिक्त-स्थान रूप में रहेगा):

मान विवरण उदाहरण
[DEŚA-KṢETRA] साधक अपने देश, राज्य, नगर एवं निकटतम पुण्य-क्षेत्र का उल्लेख करे (नीचे विस्तार से)
[GOTRA] गोत्र — कुल-परम्परा से प्राप्त कौशिक-गोत्रस्य / भारद्वाज-गोत्रायाः आदि
[NĀMA] अपना पूरा नाम अखिलेश-नामधेयस्य / आकांक्षा-नामधेयायाः
[स्वयं का जन्म-नक्षत्र] (केवल विवाहिता स्त्रियों के लिये) भरणी-नक्षत्रे / उत्तराषाढा-नक्षत्रे आदि

[DEŚA-KṢETRA] कैसे कहें — क्षेत्र-निर्देश के उदाहरण:

पारम्परिक संकल्प में साधक स्वयं के स्थान का निकटतम पुण्य-क्षेत्र से सम्बन्ध बताता है। नीचे कुछ उदाहरण दिये गये हैं — साधक अपने वर्तमान स्थान के अनुसार सबसे उपयुक्त चुनकर संकल्प में जोड़े:

  • यदि दक्षिण भारत में हैं: “श्रीशैलस्य ईशान्य-प्रदेशे, कृष्णा-कावेरी-मध्य-प्रदेशे, आन्ध्र-प्रदेश-राज्ये, हैदराबाद-नगरे” — या अपना नगर
  • यदि उत्तर भारत में हैं: “बद्रीनाथ-दक्षिण-प्रदेशे, गंगा-यमुना-मध्य-प्रदेशे, उत्तर-प्रदेश-राज्ये, वाराणसी-नगरे” — या अपना नगर
  • यदि पश्चिम भारत में हैं: “द्वारका-पूर्व-प्रदेशे, नर्मदा-तापी-मध्य-प्रदेशे, महाराष्ट्र-राज्ये, पुणे-नगरे” — या अपना नगर
  • यदि पूर्व भारत में हैं: “जगन्नाथ-पुरी-उत्तर-प्रदेशे, महानदी-गंगा-मध्य-प्रदेशे, पश्चिम-बंगाल-राज्ये, कोलकाता-नगरे” — या अपना नगर
  • यदि विदेश में हैं: भारत के निकटतम पुण्य-क्षेत्र का उल्लेख करें, तत्पश्चात् “[देश]-देशे, [नगर]-नगरे”

अन्त में “स्वगृहे” (यदि स्वयं का घर) या “शोभन-गृहे” (यदि किराये का घर) जोड़िये।

विशेष टिप्पणी (स्थिति-अनुसार):

  • विवाहिता स्त्रियों के लिये: ऊपर दी गयी “धर्मपत्नी…” पंक्ति संकल्प में सम्मिलित करें
  • अविवाहिता, विधवा, अथवा अन्य पारिवारिक स्थिति में: “धर्मपत्नी…” पंक्ति छोड़कर सीधा “अस्माकं सह-कुटुम्बानाम्…” से आगे बढ़ें
  • यदि पुरुष स्वयं व्रत कर रहे हैं (परिवार-प्रतिनिधि के रूप में — यह भी शास्त्र-सम्मत है): श्रीमतः का प्रयोग करें, श्रीमत्याः के स्थान पर

भाग 4 — श्री महागणपति षोडशोपचार पूजा (पूर्ण-मन्त्र)

वरलक्ष्मी की पूजा गणपति-वन्दन के बिना कभी नहीं आरम्भ होती। यह नियम अटल है।

एक छोटा हल्दी-गणपति (कच्ची हल्दी की गाँठ को गणेश के रूप में) पान के पत्ते पर बनाइये। मण्डप में कलश के निकट स्थापित कीजिये।

4.0 — ध्यान (गणेश-आवाहन से पूर्व)

शुक्लाम्बरधरं विष्णुं शशिवर्णं चतुर्भुजम् ।
प्रसन्नवदनं ध्यायेत् सर्वविघ्नोपशान्तये ॥

अगजानन-पद्मार्कं गजाननम् अहर्निशम् ।
अनेकदन्तं भक्तानां एकदन्तम् उपास्महे ॥

वक्रतुण्ड महाकाय सूर्यकोटि-समप्रभ ।
निर्विघ्नं कुरु मे देव सर्व-कार्येषु सर्वदा ॥

गणपति षोडशोपचार — 16 उपचार पूर्ण मन्त्र-सहित

1. आवाहन (देव का आमन्त्रण):

आगच्छ जगदाराध्य ह्येकदन्त गजानन ।
इदं स्थानं गृहीत्वा त्वं अनुगृह्णीष्व नः प्रभो ॥

ॐ श्री महागणपतये नमः आवाहयामि ॥

(हल्दी-गणपति पर अक्षत छिड़किये)

2. आसन (बैठने का स्थान अर्पण):

रत्न-सिंहासनं दिव्यं नानामणि-विभूषितम् ।
मन्दस्मित-मुखाम्भोज गृहाण गणनायक ॥

ॐ श्री महागणपतये नमः रत्न-सिंहासनं समर्पयामि ॥

(गणपति के आसन के रूप में अक्षत रखिये)

3. पाद्य (पैर धोने का जल):

गन्धोदकेन देवेश गन्ध-पुष्प-अक्षतैर्यु तम् ।
पाद्यं गृहाण देवेश सर्व-देव-नमस्कृत ॥

ॐ श्री महागणपतये नमः पाद्यं समर्पयामि ॥

(गणपति के चरणों में जल छिड़किये)

4. अर्घ्य (हाथ धोने का जल):

अर्घ्यं गृहाण हेरम्ब सर्व-भद्र-प्रदायक ।
गन्ध-पुष्प-अक्षतैर्यु क्तं पात्रस्थं पापनाशन ॥

ॐ श्री महागणपतये नमः अर्घ्यं समर्पयामि ॥

5. आचमनीय (आचमन-जल):

कर्पूर-वासितं तोयं मन्दाकिन्याः समाहृतम् ।
आचमनीयं गृहाण देव गजानन नमोऽस्तु ते ॥

ॐ श्री महागणपतये नमः आचमनीयं समर्पयामि ॥

6. स्नान (पञ्चामृत + शुद्धोदक):

पञ्चामृत-स्नान-मन्त्र:

पयोदधि-घृतोपेतं शर्करा-मधु-संयुक्तम् ।
पञ्चामृत-स्नानमिदं गृहाण गणनायक ॥

ॐ श्री महागणपतये नमः पञ्चामृत-स्नानं समर्पयामि ॥

(पञ्चामृत की बूँदें छिड़किये)

शुद्धोदक-स्नान-मन्त्र:

गङ्गा-सरस्वती-रेवा-पयोष्णी-नर्मदा-जलैः ।
स्नापितोऽसि मया देव तथा शान्तिं कुरुष्व मे ॥

ॐ श्री महागणपतये नमः शुद्धोदक-स्नानं समर्पयामि ॥

(शुद्ध जल की बूँदें छिड़किये)

स्नानान्तरम् आचमनीयं समर्पयामि — एक चम्मच जल पात्र में।

7. वस्त्र:

रक्त-वस्त्र-द्वयं चारु देव-योग्यं च मङ्गलम् ।
शुभ-प्रद गृहाण त्वं लम्बोदर हरात्मज ॥

ॐ श्री महागणपतये नमः वस्त्रम् समर्पयामि ॥

(गणपति पर अक्षत — वस्त्र के प्रतीक — छिड़किये)

8. यज्ञोपवीत (उपवीत):

राजतं ब्रह्म-सूत्रं च कञ्चुकेन समन्वितम् ।
उपवीतं इमं देव गृहाण गणनायक ॥

ॐ श्री महागणपतये नमः यज्ञोपवीतं समर्पयामि ॥

(अक्षत — यज्ञोपवीत के प्रतीक — रखिये)

9. गन्ध (चन्दन-लेप):

श्रीखण्ड-चन्दनं दिव्यं गन्धाढ्यं सुमनोहरम् ।
विलेपनं सुरश्रेष्ठ चन्दनं प्रति-गृह्यताम् ॥

ॐ श्री महागणपतये नमः चन्दनं समर्पयामि ॥

(चन्दन-लेप गणपति को अर्पण कीजिये)

10. पुष्प (फूल):

माल्यादीनि सुगन्धीनि माल्यत्यादीनि वै प्रभो ।
मया आहृतानि पुष्पाणि गृह्यन्तां पूजनाय भोः ॥

ॐ श्री महागणपतये नमः पुष्पाणि समर्पयामि ॥

(फूल एवं दूर्वा-अङ्कुर अर्पण कीजिये)

11. धूप:

वनस्पति-रसोद्भूतो गन्धाढ्यो गन्ध उत्तमः ।
आघ्रेयः सर्व-देवानां धूपोऽयं प्रति-गृह्यताम् ॥

ॐ श्री महागणपतये नमः धूपं आघ्रापयामि ॥

(धूप जलाकर गणपति के समक्ष रखिये)

12. दीप:

साज्यं त्रिवर्ति-संयुक्तं वह्निना योजितं मया ।
गृहाण मङ्गलं दीपं त्रैलोक्य-तिमिरापहम् ॥

ॐ श्री महागणपतये नमः दीपं दर्शयामि ॥

(दीपक दिखाइये)

13. नैवेद्य (भोग):

नैवेद्यं गृह्यताम् देव भक्ति मे ह्यचलां कुरु ।
ईप्सितं मे वरं देहि परत्र च परां गतिम् ॥

शर्करा-खण्ड-खाद्यानि दधि-क्षीर-घृतानि च ।
आहार-मोदकं गृहाण भो गजानन ॥

ॐ श्री महागणपतये नमः नैवेद्यं समर्पयामि ॥

(मोदक, फल, अथवा जो नैवेद्य प्रस्तुत हो, अर्पण कीजिये)

नैवेद्य-मध्ये पानीयम्:

अमृतमस्तु । अमृतोपस्तरणमसि स्वाहा ।
ॐ प्राणाय स्वाहा । ॐ अपानाय स्वाहा । ॐ व्यानाय स्वाहा ।
ॐ उदानाय स्वाहा । ॐ समानाय स्वाहा ।
ॐ ब्रह्मणे स्वाहा ॥

(जल-पात्र से बूँदें छिड़किये)

14. ताम्बूल (पान):

पूगीफल-समायुक्तं नागवल्ली-दलैर्यु तम् ।
कर्पूरैला-समायुक्तं ताम्बूलं प्रति-गृह्यताम् ॥

ॐ श्री महागणपतये नमः मुख-वासार्थं ताम्बूलं समर्पयामि ॥

(पान के पत्ते पर सुपारी रखिये)

15. नीराजन (कर्पूर-आरती):

चन्द्रादित्यौ च धरणी विद्युदग्नि-स्तथैव च ।
त्वमेव सर्व-ज्योतींषि आर्तिक्यं प्रति-गृह्यताम् ॥

ॐ श्री महागणपतये नमः कर्पूर-नीराजनं दर्शयामि ॥

(कपूर जलाकर आरती दिखाइये)

16. मन्त्र-पुष्पाञ्जलि (अन्तिम पुष्प-अर्पण एवं प्रार्थना):

गणानां त्वा गणपतिं हवामहे कविं कवीनाम् उपमश्रवस्तमम् ।
ज्येष्ठराजं ब्रह्मणां ब्रह्मणस्पत आ नः शृण्वन् ऊतिभिः सीद सादनम् ॥

ॐ श्री महागणपतये नमः मन्त्र-पुष्पाञ्जलिं समर्पयामि ॥

(दोनों हाथों में फूल लेकर गणपति को अर्पण कीजिये)

4.1 — श्री महागणपति अष्टोत्तर-शतनाम पूजा

गणपति के 108 नामों का उच्चारण। प्रत्येक नाम पर अक्षत, दूर्वा अथवा पुष्प का अर्पण। प्रत्येक नाम के अन्त में नमः। (यह सूची पान-भारत सामान्य संकलन है, रुद्रयामल-आधारित।)

ॐ विनायकाय नमः
ॐ विघ्नराजाय नमः
ॐ गौरीपुत्राय नमः
ॐ गणेश्वराय नमः
ॐ स्कन्दाग्रजाय नमः
ॐ अव्ययाय नमः
ॐ पूताय नमः
ॐ दक्षाय नमः
ॐ अध्यक्षाय नमः
ॐ द्विजप्रियाय नमः

ॐ अग्निगर्भछिदे नमः
ॐ इन्द्रश्रीप्रदाय नमः
ॐ वाणीप्रदाय नमः
ॐ अव्ययाय नमः
ॐ सर्व-सिद्धिप्रदाय नमः
ॐ शर्वतनयाय नमः
ॐ शर्वरीप्रियाय नमः
ॐ सर्वात्मकाय नमः
ॐ सृष्टिकर्त्रे नमः
ॐ देवाय नमः

ॐ अनेकार्चिताय नमः
ॐ शिवाय नमः
ॐ शुद्धाय नमः
ॐ बुद्धिप्रियाय नमः
ॐ शान्ताय नमः
ॐ ब्रह्मचारिणे नमः
ॐ गजाननाय नमः
ॐ द्वैमातुराय नमः
ॐ मुनिस्तुत्याय नमः
ॐ भक्त-विघ्न-विनाशनाय नमः

ॐ एकदन्ताय नमः
ॐ चतुर्बाहवे नमः
ॐ चतुराय नमः
ॐ शक्ति-संयुताय नमः
ॐ लम्बोदराय नमः
ॐ शूर्पकर्णाय नमः
ॐ हरये नमः
ॐ ब्रह्म-विदुत्तमाय नमः
ॐ कालाय नमः
ॐ ग्रह-पतये नमः

ॐ कामिने नमः
ॐ सोमसूर्याग्नि-लोचनाय नमः
ॐ पाशाङ्कुशधराय नमः
ॐ चण्डाय नमः
ॐ गुण-अतीताय नमः
ॐ निरञ्जनाय नमः
ॐ अकल्मषाय नमः
ॐ स्वयंसिद्धाय नमः
ॐ सिद्धार्चित-पदाम्बुजाय नमः
ॐ बीजपूरफलासक्ताय नमः

ॐ वरदाय नमः
ॐ शाश्वताय नमः
ॐ कृतिने नमः
ॐ द्विजप्रियाय नमः
ॐ वीतभयाय नमः
ॐ गदिने नमः
ॐ चक्रिणे नमः
ॐ इक्षुचाप-धृते नमः
ॐ श्रीदाय नमः
ॐ अजाय नमः

ॐ उत्पल-कराय नमः
ॐ श्रीपतये नमः
ॐ स्तुतिहर्षिताय नमः
ॐ कुल-अद्रि-भेत्रे नमः
ॐ जटिलाय नमः
ॐ कलिकल्मष-नाशनाय नमः
ॐ चन्द्र-चूडामणये नमः
ॐ कान्ताय नमः
ॐ पापहारिणे नमः
ॐ समाहिताय नमः

ॐ आश्रिताय नमः
ॐ श्रीकराय नमः
ॐ सौम्याय नमः
ॐ भक्त-वाञ्छित-दायकाय नमः
ॐ शान्ताय नमः
ॐ कैवल्य-सुख-दायिने नमः
ॐ सच्चिदानन्द-विग्रहाय नमः
ॐ ज्ञानिने नमः
ॐ दयायुताय नमः
ॐ दान्ताय नमः

ॐ ब्रह्म-द्वेष-विवर्जिताय नमः
ॐ प्रमत्त-दैत्य-भयदाय नमः
ॐ श्रीकण्ठाय नमः
ॐ विबुधेश्वराय नमः
ॐ रम-अर्चिताय नमः
ॐ विधये नमः
ॐ नागराज-यज्ञोपवीतिने नमः
ॐ स्थूल-कण्ठाय नमः
ॐ स्वयंकर्त्रे नमः
ॐ सामघोष-प्रियाय नमः

ॐ परस्मै नमः
ॐ स्थूल-तुण्डाय नमः
ॐ अग्रगण्याय नमः
ॐ धीराय नमः
ॐ वाग्ईशाय नमः
ॐ सिद्धि-दायकाय नमः
ॐ दूर्वा-बिल्व-प्रियाय नमः
ॐ अव्यक्त-मूर्तये नमः
ॐ अद्भुत-मूर्तिमते नमः
ॐ शैलेन्द्र-तनुजोत्सङ्ग-खेलनोत्सुक-मानसाय नमः

ॐ स्वलावण्य-सुधासारा-जित-मन्मथ-विग्रहाय नमः
ॐ समस्त-जगदाधाराय नमः
ॐ मायिने नमः
ॐ मूषिक-वाहनाय नमः
ॐ हृष्टाय नमः
ॐ तुष्टाय नमः
ॐ प्रसन्नात्मने नमः
ॐ सर्व-सिद्धि-प्रदायकाय नमः

श्री महागणपति अष्टोत्तर-शतनाम-पूजां समर्पयामि । इति श्री गणपति अष्टोत्तर-शतनामावलिः समाप्ता ॥

4.2 — गणपति-पूजा समापन

पूजा-समापन-प्रार्थना:

यानि कानि च पापानि जन्मान्तर-कृतानि च ।
तानि तानि विनश्यन्ति प्रदक्षिण-पदे पदे ॥

तीन प्रदक्षिणा (या एक, स्थान-अनुसार) कीजिये। सिर पर अक्षत रखिये।

गणपति अपने स्थान (हल्दी-रूप में) पर विराजमान रहेंगे — उद्वासन अगले दिन देवी-विसर्जन के साथ होगा।

भाग 5 — कलश-पूजा एवं शुद्धि

द्वितीय पात्र (जो सन्ध्या-स्थापना चरण 9 में रखा था) लीजिये। जल भरिये। उसमें अक्षत, एक फूल, एक पान का पत्ता डालिये। पात्र के तीन ओर चन्दन-लेप और कुंकुम लगाइये।

पात्र पर दायाँ हाथ रखकर यह मन्त्र बोलिये:

कलशस्य मुखे विष्णुः कण्ठे रुद्रस्समाश्रितः ।
मूले तत्रस्थितो ब्रह्मा मध्ये मातृगणाः स्थिताः ॥
कुक्षौ तु सागराः सर्वे सप्तद्वीपा वसुन्धरा ।
ऋग्वेदोऽथ यजुर्वेदः सामवेदो ह्यथर्वणः ॥
अङ्गैश्च सहितास्सर्वे कलशाम्बुसमाश्रिताः ।
आयन्तु लक्ष्मी-पूजार्थं दुरितक्षय-कारकाः ॥
गङ्गे च यमुने चैव गोदावरि सरस्वति ।
नर्मदे सिन्धु कावेरि जलेऽस्मिन् सन्निधिं कुरु ॥

फूल को इस जल में डुबोकर छिड़किये — देवी-संरचना पर (अभी भी ढँकी हुई), सामग्री पर, स्वयं पर। यह शुद्धि है — बाह्य और आन्तरिक।

भाग 6 — देवी का अनावरण एवं रत्न-सिंहासन

अब कलश / देवी-संरचना का आच्छादन हटाइये। वस्त्र हटता है, देवी का मुख प्रकट होता है।

रत्न-जटित सिंहासन (मानसिक रूप से) अर्पण कीजिये — यह देवी को उनके पूजा-सिंहासन पर विराजमान करने का समारोहिक कार्य है:

सूर्यायुत-निभस्फूर्ते स्फुरद्रत्न-विभूषिते ।
सिंहासनमिदं देवि स्थीयतां सुरपूजिते ॥

ॐ श्री वरमहालक्ष्मी देवतायै नमः नवरत्नखचित सिंहासनं समर्पयामि ॥

(टिप्पणी: रत्न-सिंहासन-अर्पण यहीं एक बार होता है; षोडशोपचार के अन्दर आसन-चरण इसी अर्पण को प्रतिष्ठापित रूप से मानता है — पुनरावृत्ति नहीं।)

भाग 7 — श्री वरमहालक्ष्मी षोडशोपचार पूजा

अब देवी के लिये सोलह उपचार — निश्चित क्रम में। प्रत्येक उपचार अपने मन्त्र और शारीरिक क्रिया के साथ।

1. ध्यान:

क्षीरोदार्णव-सम्भूते कमले कमलालये ।
सुस्थिरा भव मे गेहे सुरासुर-नमस्कृते ॥

ॐ श्री वरमहालक्ष्मी देवतायै नमः ध्यायामि ॥

(कलश के समक्ष फूल रखिये)

2. आवाहन:

सर्व-मङ्गल-माङ्गल्ये विष्णु-वक्षःस्थलालये ।
आवाहयामि देवि त्वां सुप्रीता भव सर्वदा ॥

ॐ श्री वरमहालक्ष्मी देवतायै नमः आवाहयामि ॥

(कलश के समक्ष अक्षत रखिये)

3. आसन (भाग 6 में रत्न-सिंहासन-अर्पण पहले ही सम्पन्न — यहाँ पुनरावृत्ति नहीं)

4. अर्घ्य (हाथ धोने का जल):

शुद्धोदकं च पात्रस्थं गन्धपुष्पादि-मिश्रितम् ।
अर्घ्यं दास्यामि ते देवि गृहाण सुरपूजिते ॥

ॐ श्री वरमहालक्ष्मी देवतायै नमः अर्घ्यं समर्पयामि ॥

5. पाद्य (पैर धोने का जल):

सुवासित-जलं रम्यं सर्वतीर्थ-समुद्भवम् ।
पाद्यं गृहाण देवि त्वं सर्वदेव-नमस्कृते ॥

ॐ श्री वरमहालक्ष्मी देवतायै नमः पाद्यं समर्पयामि ॥

6. आचमनीय — अर्घ्य-पात्र में एक चम्मच जल।

7. पञ्चामृत-स्नान:

पयोदधि-घृतोपेतं शर्करा-मधु-संयुक्तम् ।
पञ्चामृत-स्नानमिदं गृहाण कमलालये ॥

(कलश पर पञ्चामृत की कुछ बूँदें छिड़किये)

8. शुद्धोदक-स्नान:

गङ्गाजलं मयानीतं महादेव-शिरःस्थितम् ।
शुद्धोदक-स्नानमिदं गृहाण विधुसोदरि ॥

(पुनः शुद्ध जल की कुछ बूँदें छिड़किये)

स्नानान्तरम् आचमनीयं समर्पयामि (अर्घ्य-पात्र में एक चम्मच जल)

9. वस्त्र:

सुरार्चिताङ्घ्रि-युगले दुकूल-वसनप्रिये ।
वस्त्र-युग्मं प्रदास्यामि गृहाण हरिवल्लभे ॥

ॐ श्री वरमहालक्ष्मी देवतायै नमः वस्त्र-युग्मं समर्पयामि ॥

(साड़ी / ब्लाउज़-पीस अर्पण कीजिये)

10. आभरण:

केयूर-कङ्कण दिव्ये हार-नूपुर-मेखला ।
विभूषणान्य् अमूल्यानि गृहाण ऋषिपूजिते ॥

ॐ श्री वरमहालक्ष्मी देवतायै नमः आभरणानि समर्पयामि ॥

(स्वर्ण-आभूषण उपलब्ध हों तो अर्पण करें; अन्यथा भाव से अर्पण करें)

11. उपवीत (यज्ञोपवीत — प्रतीक):

तप्तहेम-कृतं सूत्रं मुक्तादाम-विभूषितम् ।
उपवीतमिदं देवि गृहाण त्वं शुभप्रदे ॥

(चन्दन-लेप में डूबे सिरे वाला सूती धागा कलश से बाँधिये)

12. गन्ध (चन्दन-लेप):

कर्पूरागरु-कस्तूरी-गोरोचनादि-भिरन्वितम् ।
गन्धं दास्याम्यहं देवि प्रीत्यर्थं प्रति-गृह्यताम् ॥

(कलश पर चन्दन-लेप छिड़किये)

13. अक्षत:

अक्षतान् धवलान् दिव्यान् शालेयान् तण्डुलान् शुभान् ।
हरिद्रा-कुङ्कुमोपेतान् गृह्यताम् अब्धिपुत्रिके ॥

(देवी के चरणों में अक्षत रखिये)

14. पुष्प:

मल्लिका-जाजी-कुसुमै श्चम्पकैर्वकुलैस्तथा ।
नीलोत्पलैश्च कल्हारै पूजयामि हरिप्रिये ॥

(देवी के समक्ष फूल अर्पण कीजिये)

7.1 — अङ्ग-पूजा (देवी के अङ्गों की क्रमिक पूजा)

देवी के प्रत्येक अङ्ग की पृथक पूजा। प्रत्येक नाम बोलते हुए मूर्ति / कलश के तदनुरूप अङ्ग को अक्षत या पुष्प से स्पर्श कीजिये:

  • ॐ चञ्चलायै नमः — पादौ पूजयामि (चरण)
  • ॐ चपलायै नमः — जानुनी पूजयामि (जानु)
  • ॐ पीताम्बरधरायै नमः — कटिं पूजयामि (कटि)
  • ॐ कमलवासिन्यै नमः — नाभिं पूजयामि (नाभि)
  • ॐ पद्मालयायै नमः — उदरं पूजयामि (उदर)
  • ॐ मदनमात्रे नमः — स्तनौ पूजयामि (वक्ष)
  • ॐ कम्बुकण्ठ्यै नमः — कण्ठं पूजयामि (कण्ठ)
  • ॐ सुमुखायै नमः — मुखं पूजयामि (मुख)
  • ॐ सुनेत्रायै नमः — नेत्रे पूजयामि (नेत्र)
  • ॐ रमायै नमः — कर्णौ पूजयामि (कर्ण)
  • ॐ कमलायै नमः — शिरः पूजयामि (शिर)
  • ॐ श्री वरलक्ष्म्यै नमः — सर्वाण्य् अङ्गानि पूजयामि (सर्वाङ्ग)

7.2 — अष्टोत्तर-शतनाम पूजा

देवी के 108 नामों का उच्चारण। प्रत्येक नाम पर अक्षत या पुष्प अर्पण। प्रत्येक नाम के अन्त में नमः

ॐ प्रकृत्यै नमः
ॐ विकृत्यै नमः
ॐ विद्यायै नमः
ॐ सर्वभूत-हितप्रदायै नमः
ॐ श्रद्धायै नमः
ॐ विभूत्यै नमः
ॐ सुरभ्यै नमः
ॐ परमात्मिकायै नमः
ॐ वाचै नमः
ॐ पद्मालयायै नमः

ॐ पद्मायै नमः
ॐ शुच्यै नमः
ॐ स्वाहायै नमः
ॐ स्वधायै नमः
ॐ सुधायै नमः
ॐ धन्यायै नमः
ॐ हिरण्मय्यै नमः
ॐ लक्ष्म्यै नमः
ॐ नित्यपुष्टायै नमः
ॐ विभावर्यै नमः

ॐ अदित्यै नमः
ॐ दित्यै नमः
ॐ दीप्तायै नमः
ॐ वसुधायै नमः
ॐ वसुधारिण्यै नमः
ॐ कमलायै नमः
ॐ कान्तायै नमः
ॐ क्षमायै नमः
ॐ क्षीरोदार्णव-सम्भवायै नमः
ॐ अनुग्रहप्रदायै नमः

ॐ बुद्ध्यै नमः
ॐ अनघायै नमः
ॐ हरिवल्लभायै नमः
ॐ अशोकायै नमः
ॐ अमृतायै नमः
ॐ दीप्तायै नमः
ॐ लोकशोक-विनाशिन्यै नमः
ॐ धर्मनिलयायै नमः
ॐ करुणायै नमः
ॐ लोकमात्रे नमः

ॐ पद्मप्रियायै नमः
ॐ पद्महस्तायै नमः
ॐ पद्माक्ष्यै नमः
ॐ पद्मसुन्दर्यै नमः
ॐ पद्मोद्भवायै नमः
ॐ पद्ममुख्यै नमः
ॐ पद्मनाभप्रियायै नमः
ॐ रमायै नमः
ॐ पद्ममालाधरायै नमः
ॐ देव्यै नमः

ॐ पद्मिन्यै नमः
ॐ पद्मगन्धिन्यै नमः
ॐ पुण्यगन्धायै नमः
ॐ सुप्रसन्नायै नमः
ॐ प्रसादाभिमुख्यै नमः
ॐ प्रभायै नमः
ॐ चन्द्रवदनायै नमः
ॐ चन्द्रायै नमः
ॐ चन्द्रसहोदर्यै नमः
ॐ चतुर्भुजायै नमः

ॐ चन्द्ररूपायै नमः
ॐ इन्दिरायै नमः
ॐ इन्दुशीतलायै नमः
ॐ आह्लादजनन्यै नमः
ॐ पुष्ट्यै नमः
ॐ शिवायै नमः
ॐ शिवकर्यै नमः
ॐ सत्यै नमः
ॐ विमलायै नमः
ॐ विश्वजनन्यै नमः

ॐ तुष्ट्यै नमः
ॐ दारिद्र्य-नाशिन्यै नमः
ॐ प्रीतिपुष्करिण्यै नमः
ॐ शान्तायै नमः
ॐ शुक्लमाल्याम्बरायै नमः
ॐ श्रियै नमः
ॐ भास्कर्यै नमः
ॐ बिल्वनिलयायै नमः
ॐ वरारोहायै नमः
ॐ यशस्विन्यै नमः

ॐ वसुप्रदायै नमः
ॐ शुभायै नमः
ॐ हिरण्यप्राकारायै नमः
ॐ समुद्रतनयायै नमः
ॐ जयायै नमः
ॐ मङ्गलायै नमः
ॐ देव्यै नमः
ॐ विष्णु-वक्षःस्थ:स्थितायै नमः
ॐ विष्णुपत्न्यै नमः
ॐ प्रसन्नाक्ष्यै नमः

ॐ नारायण-समाश्रितायै नमः
ॐ दारिद्र्य-ध्वंसिन्यै नमः
ॐ देव्यै नमः
ॐ सर्वोपद्रव-वारिण्यै नमः
ॐ नवदुर्गायै नमः
ॐ महाकाल्यै नमः
ॐ ब्रह्मविष्णुशिवात्मिकायै नमः
ॐ त्रिकालज्ञान-सम्पन्नायै नमः
ॐ भुवनेश्वर्यै नमः
ॐ श्री देव्यै नमः

ॐ सुप्रसन्नायै नमः
ॐ उदाराङ्ग्यै नमः
ॐ हरिण्यै नमः
ॐ हेममालिन्यै नमः
ॐ धन-धान्य-कर्यै नमः
ॐ सिद्ध्यै नमः
ॐ स्त्रैण-सौम्यायै नमः
ॐ शुभप्रदायै नमः
ॐ नृप-वेश्म-गतानन्दायै नमः
ॐ श्री वरलक्ष्म्यै नमः ॥

श्री लक्ष्म्यष्टोत्तर-शतनाम-पूजां समर्पयामि । इति श्री लक्ष्म्यष्टोत्तर-शतनामावलिः समाप्ता ॥

7.3 — धूप, दीप, नैवेद्य

धूप (सुगन्धित द्रव्य):

दशाङ्गं गुग्गुलोपेतं सुगन्धं सुमनोहरम् ।
धूपं दास्यामि देवेशि श्री वरलक्ष्मी गृहाण त्वम् ॥

(धूप जलाकर देवी के चारों ओर तीन बार घुमाइये)

दीप:

घृताक्तवर्ति-संयुक्तम् अन्धकार-विनाशकम् ।
दीपं दास्यामि देवेशि गृहाण मुदितो भव ॥

(दीपक दायें हाथ से देवी को दिखाइये)

नैवेद्य (भोग-अर्पण):

नैवेद्यं षड्रसोपेतं दधिमध्वाज्य-संयुतम् ।
नानाभक्ष्य-फलोपेतं गृहाण हरिवल्लभे ॥

(सम्पूर्ण तैयार प्रसाद — 3, 5 अथवा 7 वस्तुएँ — अर्पण कीजिये)

नैवेद्य-मध्ये पानीयम्:

अमृतमस्तु । अमृतोपस्तरणमसि स्वाहा ।
ॐ प्राणाय स्वाहा । ॐ अपानाय स्वाहा । ॐ व्यानाय स्वाहा ।
ॐ उदानाय स्वाहा । ॐ समानाय स्वाहा ।
ॐ ब्रह्मणे स्वाहा ॥

(पान के पत्ते से कुछ बूँदें जल छिड़किये)

ताम्बूल:

पूगीफल-समायुक्तं नागवल्ली-दलैर्युतम् ।
कर्पूर-चूर्ण-संयुक्तं ताम्बूलं प्रति-गृह्यताम् ॥

(देवी के समक्ष दो केले और सुपारी दो पान के पत्तों पर रखिये)

7.4 — तोरण-बन्धन (सूत्र-अर्पण एवं धारण)

यह व्रत की विशिष्ट क्रिया है। तोरण — नौ गाँठों वाला हल्दी-रँगा सूती धागा — साधक के दायें हाथ की कलाई पर बाँधा जाता है, देवी की निरन्तर उपस्थिति और रक्षा के आवाहन के साथ।

तोरण की तैयारी: पाँच या नौ धागों वाला सफ़ेद सूती धागा; हल्दी-लेप। नौ गाँठें बाँधिये।

तोरण को दायें हाथ की कलाई पर बाँधते समय यह मन्त्र बोलिये:

बध्नामि दक्षिणे हस्ते नवसूत्रं शुभप्रदम् ।
पुत्रपौत्रा-भिवृद्धिं च मम सौख्यं देहि मे रमे ॥

7.5 — वायन-दान (देवी को अर्पण एवं सुमङ्गलियों को दान)

वायन-दान दो चरणों में होता है:

चरण A — देवी को वायन-अर्पण:

सर्वप्रथम, सभी 5, 7 अथवा 9 वायन-सेट देवी के समक्ष रखिये। वायन-अर्पण-मन्त्र बोलिये:

एवं सम्पूज्य कल्याणीं वरलक्ष्मीं स्वशक्तितः ।
दातव्यं द्वादश-पूरं वयनं हि द्विजायते ॥

इन्दिरा प्रति-गृह्णातु इन्दिरा वै ददाति च ।
इन्दिरा तारकोभाभ्यां इन्दिरायै नमो नमः ॥

देवी से अनुमति लेकर, ये वायन-सेट देवी के प्रतिनिधि-रूप में सुमङ्गलियों को दिये जाएँगे।

चरण B — सुमङ्गलियों को वायन-दान:

देवी को अर्पित वायन अब 5, 7 अथवा 9 सुमङ्गलियों को (परिवार-सामर्थ्य के अनुसार; दक्षिण-भारत में सामान्यतः 5 सुमङ्गली) प्रदान कीजिये। सुमङ्गली-स्त्रियों को साक्षात् देवी-स्वरूप मानकर आदर के साथ अर्पण कीजिये। प्रत्येक सुमङ्गली को एक-एक वायन-सेट दीजिये, तत्पश्चात् उनका आशीर्वाद ग्रहण कीजिये।

(टिप्पणी: यह वायन-दान की परम्परा है — साधक स्वयं देवी को अर्पित करके, देवी के प्रतिनिधि रूप में सुमङ्गलियों को यह दान करता है। इस प्रक्रिया में देवी की उपस्थिति सुमङ्गलियों में मानी जाती है।)

7.6 — नीराजन (आरती)

अनुष्ठान:

  1. कपूर-प्रज्ज्वलन: आरती-थाली में शुद्ध कपूर रखिये। कपूर को अग्नि से प्रज्ज्वलित कीजिये।
  1. आरती-दर्शन: आरती-थाली को देवी के समक्ष वर्तुल आकार में घुमाइये — दायें से बायें दिशा में (देवी की दृष्टि से बायें से दायें)। यह क्रम देवी के मुख से पादपर्यन्त और पुनः मुख तक तीन बार दोहराइये।
  1. परिक्रमा: आरती के पश्चात्, तीन (अथवा पाँच) प्रदक्षिणा कीजिये — यदि स्थान अनुमति दे, मण्डप के चारों ओर; अन्यथा अपने स्थान पर स्वयं घूमकर।
  1. आरती-जल-सिञ्चन: आरती-थाली की अग्नि पर हाथ रखकर, फिर उस हाथ को नेत्रों एवं मस्तक पर स्पर्श कीजिये — यह देवी के तेज का ग्रहण है।

पारम्परिक माङ्गलिक-आरती-गीत साधक अपनी परम्परा-अनुसार गा सकते हैं। शुभकाल का आरती-संग्रह (श्री महालक्ष्मी आरती, मङ्गल-हार्ती इत्यादि) पृथक पृष्ठों पर उपलब्ध होगा — [ARATI PAGE LINK]।

7.7 — कथा-श्रवण (व्रत-कथा)

अब व्रत-कथा पढ़ी अथवा सुनी जाती है। यह कथा पारम्परिक रूप से सूत महर्षि द्वारा शौनकादि ऋषियों को कही गयी थी, और आगे विभिन्न परम्पराओं द्वारा संरक्षित हुई।

श्री वरलक्ष्मी व्रत-कथा (स्कन्द पुराण-आधारित)

एक बार शौनकादि महर्षियों ने सूत महर्षि से प्रार्थना की — “हे मुनिवर! स्त्रियों को सौभाग्य प्रदान करने वाले किसी उत्तम व्रत का उपदेश कीजिये।” सूत महर्षि ने कहा — “मुनियो! स्त्रियों के लिये सर्वसौभाग्यदायक, पुत्र-पौत्र-प्रदाता एवं सर्व-कल्याणकारी एक व्रत है, जिसे स्वयं भगवान् परमेश्वर ने माता पार्वती को कथित किया था। लोक-कल्याण की दृष्टि से मैं वही व्रत आपको सुनाता हूँ — श्रद्धा से श्रवण कीजिये।”

एक समय भगवान् परमेश्वर अपने भस्म-सिंहासन पर विराजमान थे। नारद महर्षि एवं इन्द्रादि दिक्पाल स्तुति-स्तोत्रों से उनकी आराधना कर रहे थे। उस दिव्य आनन्द के समय माता पार्वती ने भगवान् परमेश्वर से कहा — “स्वामी! स्त्रियाँ सर्व-सुख प्राप्त करके, पुत्र-पौत्र-अभिवृद्धि के साथ जीवन-पार हों — इस निमित्त कोई उत्तम व्रत बताइये।”

तब त्रिनेत्र भगवान् ने कहा — “देवि! तुम्हारी इच्छा-अनुसार स्त्रियों को समस्त शुभ प्रदान करने वाला एक व्रत है — वह वरलक्ष्मी व्रत है। इसे श्रावण-मास के द्वितीय शुक्रवार को सम्पन्न करना चाहिये।” पार्वती ने पूछा — “देव! इस वरलक्ष्मी व्रत को आदि में किन देवताओं ने किया था? इसे किस विधि से करना चाहिये? विस्तार से बताइये।”

तब भगवान् परमेश्वर ने कहा — “कात्यायनि! पूर्व-काल में मगध-देश में कुण्डिनपुर नामक एक नगरी थी। वहाँ चारुमती नाम की एक सद्गुण-सम्पन्न, विनयशीला, भक्तिमती एवं पति-सेवा-परायणा सद्गृहस्थ ब्राह्मणी रहती थी। वह प्रतिदिन प्रातःकाल उठकर पति के चरणों में नमस्कार करती, प्रातःकाल के गृह-कार्य पूर्ण करती, अपने सास-श्वसुर की सेवा करती, और सबसे मित-भाषण करते हुए धर्मानुसार जीवन व्यतीत करती थी।”

“एक रात्रि, वरलक्ष्मी व्रत की अधिष्ठात्री देवी वरलक्ष्मी ने चारुमती को स्वप्न में साक्षात्-दर्शन दिया। देवी ने कहा — ‘हे चारुमती! श्रावण-मास की पूर्णिमा से पूर्व आने वाले शुक्रवार को मेरा पूजन कर। तू जो वर माँगेगी, जो कामनाएँ चाहेगी — मैं तुझे प्रदान करूँगी।’ इतना कहकर देवी अन्तर्धान हो गयीं।”

“चारुमती अत्यन्त प्रसन्न हुई। उसने प्रार्थना की — ‘हे जननी! तेरी कृपा-कटाक्ष जिन पर होती है, वे धन्य हैं। वे सम्पन्न एवं विद्वान् होकर लोक में सम्मान पाते हैं। हे पावनी! मेरे पूर्व-जन्म के सुकृत के फल-स्वरूप मुझे आपके दर्शन प्राप्त हुए हैं।’ नाना प्रकार से उसने देवी की स्तुति की। तत्पश्चात् चारुमती जागी, स्वप्न को यथार्थ मानते हुए उसने अपने पति एवं सास-श्वसुर को यह बात कही। वे अत्यन्त प्रसन्न हुए, और चारुमती से कहा — ‘तू यह वरलक्ष्मी व्रत अवश्य कर।'”

“नगर की स्त्रियाँ चारुमती के स्वप्न की बात सुनकर, आगामी श्रावण-शुक्रवार के दिन प्रातःकाल उठीं, तेल-अभ्यंग-स्नान किया, रेशमी वस्त्र धारण किये, और चारुमती के घर पहुँचीं। चारुमती ने अपने घर में मण्डप-रचना की, उस मण्डप के ऊपर चावल की एक पर्त बिछाई, आम-वट-पीपल-अशोक-आदि पञ्च-पल्लव-आम्रपत्रों से युक्त कलश की स्थापना की। संकल्प-विधि के साथ देवी वरलक्ष्मी का आवाहन एवं प्रतिष्ठापन किया — ‘सर्व-मङ्गल-माङ्गल्ये शिवे सर्वार्थ-साधिके । शरण्ये त्र्यम्बके देवि नारायणि नमोऽस्तु ते ॥’ — यह मन्त्र बोलते हुए।”

“(जिसकी जैसी सामर्थ्य हो, वैसे — स्वर्ण, चाँदी, ताम्र अथवा मिट्टी की मूर्ति स्थापित की जा सकती है।) उन्होंने देवी की षोडशोपचार-पूजा की, भक्ष्य-भोज्य पदार्थ अर्पित किये, नौ धागों वाला तोरण अपने हाथ में बाँधा, प्रदक्षिणा-नमस्कार सम्पन्न किये।”

“यह उत्तम व्रत ब्राह्मणादि चार-वर्णों के जन कर सकते हैं। जो इसे करते हैं, वे समस्त सौभाग्य प्राप्त करते हैं और सुख से रहते हैं। इस कथा को श्रवण एवं पठन करने वालों को भी वरलक्ष्मी व्रत के प्रसाद-स्वरूप समस्त सुख प्राप्त होते हैं।”

॥ इति श्री वरलक्ष्मी-व्रत-कथा सम्पूर्णा ॥

7.8 — समापन-स्तोत्र-पाठ

तीन स्तोत्रों का क्रमशः पाठ कीजिये। तीनों का सम्पूर्ण पाठ शुभकाल के स्तोत्र-संग्रह में उपलब्ध है:

1. श्री सूक्तम् (लक्ष्मी को समर्पित वैदिक स्तोत्र, 15 मन्त्र) — [STOTRA LINK: Śrī Sūktam]

2. श्री महालक्ष्मी अष्टकम् (इन्द्र-कृत 8-श्लोक स्तोत्र) — [STOTRA LINK: Śrī Mahālakṣmī Aṣṭakam]

प्रारम्भिक श्लोक:

नमस्तेऽस्तु महामाये श्रीपीठे सुरपूजिते ।
शङ्खचक्रगदाहस्ते महालक्ष्मी नमोऽस्तु ते ॥

3. कनकधारा स्तोत्र (आदि शङ्कराचार्य विरचित) — [STOTRA LINK: Kanakadhārā Stotra]

(टिप्पणी: यदि आप ऑफ़लाइन व्रत सम्पन्न कर रहे हैं, इन तीनों स्तोत्रों की पूर्ण प्रति व्रत से पूर्व मुद्रित करके तैयार रखिये।)

7.9 — मन्त्र-पुष्प, प्रदक्षिणा, नमस्कार

समापन-मन्त्र के साथ मन्त्र-पुष्प अर्पण कीजिये। तीन अथवा पाँच प्रदक्षिणा (परिक्रमा) कीजिये — यदि स्थान अनुमति दे, मण्डप के चारों ओर; अन्यथा अपने स्थान पर स्वयं घूमकर। साष्टाङ्ग-नमस्कार कीजिये।

इति पूजा-विधानं सम्पूर्णम् ।

भाग 8 — उपवास एवं आहार-नियम

वरलक्ष्मी व्रत में साधारणतः पूर्ण उपवास आवश्यक नहीं है। शास्त्र इस विषय में लचीलापन देते हैं।

आहार-सम्बन्धी सामान्य मार्गदर्शन:

  • फलाहार: व्रत-दिवस केवल फल, दूध, दही, नारियल-पानी, सूखे मेवे — यह सर्वाधिक शुभ माना जाता है
  • सात्त्विक आहार: यदि पूर्ण फलाहार सम्भव न हो, तो सात्त्विक आहार (चावल, गेहूँ, दूध-आधारित) एक बार लेना — बिना प्याज-लहसुन, बिना तामसिक द्रव्य
  • पूजा-पूर्व: पूजा से पूर्व केवल जल-आचमन ही ठीक है; पूजा के पश्चात् नैवेद्य ग्रहण करके भोजन आरम्भ करें

काव्यत: यदि आपकी कुल-परम्परा में विशेष उपवास-विधि प्रचलित है (निर्जल, एक-आहार, अथवा अन्य), तो अपनी पारिवारिक परम्परा का पालन करें। शास्त्र-मार्ग व्यक्तिगत-परम्परा को सर्वोच्च मानता है।

भाग 9 — उद्वासन / विसर्जन (अगले दिन)

कलश एवं हल्दी-गणपति उस रात वेदी पर ही रहेंगे। अगली सुबह — गणपति एवं देवी दोनों का उद्वासन एक साथ सम्पन्न होता है।

9.1 — पूर्व-तैयारी

  1. पूजा-कक्ष में प्रवेश से पूर्व स्नान।
  2. वेदी के समक्ष बैठिये।
  3. देवी एवं गणपति दोनों को संक्षिप्त ध्यान अर्पित कीजिये।

9.2 — गणपति-उद्वासन

गणपति को पहले उद्वासित कीजिये (यज्ञ-परम्परा में आगमन-क्रम का उलटा — जो पहले आये, वे बाद में जाएँ):

गच्छ गच्छ सुरश्रेष्ठ स्वस्थानं परमेश्वर ।
यत्र ब्रह्मादयो देवाः तत्र गच्छ गजानन ॥

ॐ श्री महागणपतये नमः यथा-स्थानं प्रवेशयामि ॥

(गणपति के हल्दी-स्वरूप पर अक्षत छिड़किये)

9.3 — देवी-उद्वासन (विसर्जन)

तत्पश्चात् देवी को उद्वासित कीजिये:

यान्तु देवगणाः सर्वे पूजामादाय पार्थिवीम् ।
इष्ट-कामार्थ-सिद्ध्यर्थं पुनरागमनाय च ॥

ॐ श्री वरमहालक्ष्मी देवतायै नमः यथा-स्थानं प्रवेशयामि ॥

गच्छ गच्छ परं-स्थानं ब्रह्म-लोकं जगत्प्रसू ।
पूजाराधन-कालेषु पुनरागमनाय च ॥

(देवी के मुखवत्र पर अक्षत छिड़किये; यह अन्तिम अर्पण है)

9.4 — प्रसाद-वितरण एवं समापन-क्रियाएँ

  1. प्रसाद को परिवार, पड़ोसियों और अतिथियों में वितरण कीजिये। ताम्बूल उनकी लक्ष्मी-आवाहन-भूमिका के रूप में अर्पण कीजिये।
  2. कलाई पर बँधे तोरण को केवल विसर्जन के पश्चात् ही खोलें, इससे पहले नहीं। खोलकर अच्छी तरह सुरक्षित स्थान पर रखिये अथवा जल में विसर्जित कीजिये।
  3. नारियल को श्रद्धा-सहित संरक्षित कीजिये या जल में विसर्जित कीजिये।
  4. कलश के जल को घर के चारों ओर छिड़किये — यह मङ्गल-कारक है। शेष जल को घर में सुरक्षित रखिये।
  5. हल्दी-गणपति को श्रद्धा-सहित तुलसी-वृक्ष के मूल में समर्पित कीजिये अथवा जल में विसर्जित कीजिये।

इति व्रत-सम्पूर्णम् ।

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